निंदिया के उड़न खटोले में

​नींद भी क्या नेमत है जिसके लिए दुनिया में करोड़ों लोग तरसते हैं, लाखों लोग इलाज करवा दवाइयाँ खाते हैं और जाने कितने हज़ारों रात रात भर बिस्तर पर सर पटकते थक जाते हैं पर सो नहीं पाते। और फिर मिथकों में कुम्भकरण जैसे भी हैं जो ब्रह्मा के श्राप से छह महीनों तक गहरी नीदं में रहते थे। या फिर यूरोपीय मिथक में सम्राट स्टेफेन और रानी लिआ: की बेटी अरोरा, जो स्लीपिंग ब्यूटी नामक कहानी से जानी जाती है, उन्हें भी श्राप था की वो सौ बरस तक सोती ही रहेंगी। ऐसा क्यों है के जहाँ कुछ लोग बिलकुल सो नहीं पाते वहाँ कुछ लोग लम्बी तान के दिनों-दिन सो सकते हैं। कौन हैं ऐसे नसीबवर जिन्हे निंदिया के उड़न खटोले का अपार आनंद मिलता है।
माँ को ये उड़न खटोला और निंदिया का ख़जाना मिल गया है। माँ अब ज्यादा समय सोती है, दिन हो या रात। कोई ख़ुमारी नहीं, ना ही तबियत में कोई बदलाव है पर फिर भी नींद उन्हें घेरे रहती है। आँखें भारी, गला रुँधा, आवाज़ दबी, बीच बीच में उबासी और निद्राग्रस्त आलस । वज़ह शायद मौसम हो सकता है, जो बदल रहा है। बाहर हवा ठंडी हो चली है, दिन छोटे हो गए हैं, अँधेरा जल्दी हो जाता है पर इस सब का माँ की नींद से क्या रिश्ता है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले तो दिन के वक़्त कभी किताब पढ़ लेती थीं, कभी भजन गुनगुना लेती थीं या फिर अपने भाई या बहनों से फ़ोन पे बात कर लेती थीं पर अब वो भी नहीं होता। यहां तक ​​कि जब शाम के वक़्त टीवी चालू भी होता है तब भी वो ऊँघ रही होती हैं, जब कि हम एक ही कमरे में बैठे होते हैं तब भी वह आंखें बंद कर लेती है और सो जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि इसका कारण कोई बिमारी या दवाइयाँ तो नहीं है क्यूंकि उनकी सेहत अब पहले से कहीं बेहतर है।
क्यूंकि माँ बिना मदद के चल नहीं पाती और सीढ़ियां नहीं चढ़-उतर पाती तो उनका घर के बाहर आना जाना भी काफी आरसे से मुमकिन नहीं हुआ। बीच बीच में हम लोगो उन्हें जबरदस्ती से बाहर आँगन में ला कर धूप में बिठला देते हैं पर जैसे ही सूर्य महाशय जगह बदलते हैं और गर्माहट कम होती है तो माँ भी वहां से खिसक लेती हैं। पिछले बरस तक धूप में बैठ कर मूली, मूंगफली, बेर और गुड़ मज़े से खाती थीं अब उस सब का शौक़ भी नहीं रहा। दोपहर को बस खाना खाने के लिए उठती भर हैं और फिर से बिस्तर। वो दुबला शरीर रज़ाई का वज़न भी कैसे सहता होगा ?
सर्दियाँ शुरू हो गई हैं इसलिए वह सुबह देर तक बिस्तर पर रहती है, देर से उठती है और 9.30 बजे तक ही चाय पीने को कमरे से बाहर आती हैं। जिसके बाद वह फिर से बिस्तर पर लेट, रज़ाई लपेट और आंखें बंद करके सो जाती है। मैं सोचता हूँ इतनी देर कोई कैसे सो सकता है पर शायद इस उम्र में ऐसे ही होता होगा। दो-एक घंटे बाद नहाने के लिए तभी जाती है अगर उनका मन होता है। ज्यादातर वो अलसाई सी रहती हैं। पिछले हफ्ते वह पांच दिन बाद नहाई थी। इसके बाद स्वेटर पहना कर उन्हें शॉल ओढ़ा दी जाती है। अभी टोपी नहीं निकली है तो शाल से ही सर को ढक लेती हैं। नहाने के बाद चाय का एक दौर ऐसा चलता है जिसमे चाय पीते पीते वो झपकी ले रही होती हैं और हमे डर लगता है कि चाय की कटोरी समेत झुक कर वो मेज़ से ना टकरा जाएँ।
​मां की बिगड़ती सेहत के चलते एक अरसे से घर की हर छोटी बड़ी बात उनके चारों ओर घूमती है, वो धुर्री हैं हम सब फ़िरकी। मसलन सुबह की चाय तब बनेगी जब माँ उठेंगी, नाश्ता तब बनेगा या परोस जाएगा जब माँ हाथ-मुंह धो कर ताजा तैयार हो जाएँगी, दोपहर का खाना तब टेबल पर लगेगा जब उनका मन होगा, जो कि कभी-कभी शाम चार बजे तक टल जाता है। शाम की चाय, टीवी का चैनल, दरवाज़ा बंद रहेगा या खुला, पंखा धीमे या तेज़, परदे खुले रहेंगे या ढके, कब कोई बाहर जा सकता है और कहाँ, वग़ैरह वग़ैरह सब माँ के हिसाब से चलता है। अगर वो सो रही हों तो आजकल उनके कमरे के अंदर और बाहर डाइनिंग रूम में साफ सफाई नहीं की जाती, रसोई में बर्तन धोने के लिए दरवाजा बंद कर दिए जाते हैं – मिक्सर ग्राइंडर नहीं चलाया जाता, किसी भी तरह से कोई शोर नहीं हो सकता या तेज आवाज में बोला नहीं जाता, सिर्फ इसलिए कि कहीं माँ की नींद में ख़लल ना पड़े।
हम उनके कमरे का दरवाजा बंद नहीं कर सकते, इससे वो नाराज़ हो जाती हैं। अगर दरवाज़ा सरका कर आप अंदर झाँक लें और वो जाग रही हों तो पूछ लेती हैं, “क्या चाहिए?” उनके कमरे के बाहर कुछ हलचल हो तो वो पूछती हैं, “कौन है?”। आजकल ये दो हर्फ़ उनका तकिया कलाम हैं। ‘कौन है’ का उन्हें पूरा और साफ जवाब चाहिए होता है, कुछ भी कह कर आप उन्हें टाल नहीं सकते। वो शख़्स कौन है, उसका नाम क्या है वो बाहर क्या कर रहा है, घर में क्यों आया है – ये सब उन्हें तफ़सील से जानना होता है। फ़िर उसके बाद वो ही, उनकी प्यारी निंदिया का उड़न खटोला निकल पड़ता है।
कुछ दिन पहले देर रात अपने बिस्तर के दूसरी तरफ इशारा करते हुए माँ ने पूछा, “यहां किस ने सोना है?” रजनी ने जवाब में पूछ लिया “पर क्यों?” अब उनका जवाब सुनिए, “पता होना चाहिए ना कि यहां कौन सो रहा है, ताकि उस हिसाब से हम अपना मूड बनाएं।” इसका क्या जवाब देगा कोई। कल उनकी बड़ी बहन सरला का फ़ोन आया सो मैंने मासी को बताया कि माँ सो रही हैं, फिर भी मैंने माँ को उठा दिया और कहा कि वो बात कर लें । अब अपनी बड़ी बहन से उनका जो वार्तालाप हुआ आप ही सुन लीजिये।
“अगर सोऊँ नहीं तो और मैं क्या करूं?
क्यूँ दिन भर बैठूं?
मैंने किसी का कोई कर्ज देना है क्या?
क्यूँ राम-राम बोलूं, वो राम क्या देगा मुझे?
उसके बिना भी अच्छी मौत आएगी मुझे, हाँ ।
नहीं, मुझे नहीं पढ़ना कुछ, होर की। रामायण, भागवत सब पढ़ लिया है, कई बार, कुझ खास नहीं मिला मुझे उनमे ।”
दूसरी तरफ से क्या सवाल हो रहे होंगे इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। आराम-तलबी हो तो ऐसी हो जो सब से बेपरवाह हो, भाई, बहन, बेटा, बहु या फिर किताबों के भगवान ही क्यों न हों । मुझे याद आ रहा है: किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइये, आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढक के सोईये
वैसे आराम-तलबी से बढ़िया हो भी क्या सकता है। तनाव को ख़ारिज करने की सबसे बढ़िया दवा है आराम। बीच बीच में उनकी नींद के बारे में सोच मुझे रश्क़ भी होता है, क़ाश मैं भी इतनी मस्ती में सो सकता, दिन भर नहीं तो दो चार घंटे ही सही। ये कमबख़्त काम कोई और कर ले, मुझे छुटी मिले, में भी पहाड़ पे जा किसी बुगियाल की नरम घास पे वो गुलज़ार साहेब वाली “पीली धूप” में सो सकूँ, शायद मुझे भी उसके छपाक से गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए।
माँ अध-सोइ अध-जगी आँखों से बातें भी कर लेती हैं, सपने भी देख लेती हैं और बवक़्त लाहौर में अपने बचपन के घर भी घूम आती हैं। दोस्तों से मिल आती हैं, “कोकिला छपाकि जुम्मे रात आई जे” खेल आती हैं, अपनी नानी से झंग जा कर मिल भी आती हैं। पिछले दिनों अपनी छोटी बहन रानी से नींद में बाते करतें कह रहीं थी “आजकल मैं लाहौर आयी हुई हूँ।” ये सुनकर मैं तो कुर्सी से गिरने वाला था। लेटे हुए अगर उनकी गर्दन दाईं तरफ़ घूमी हो तो अपने कमरे के बाहर आने-जाने वाले दो बाशिंदो पे नज़र रखे होती हैं और अगर वो ही गर्दन बायीं तरफ़ हो तो सामने लगी सुब्रोतो मंडल की पेंटिंग से सीक्रेट गुफ्तगू कर रही होती हैं।
सुब्रोतो मंडल की वो पेंटिंग एक जवां शख्स का पोर्ट्रेट है, कुछ कुछ चरवाहा, भैंस चराने वाला, ग्वाला, घुमक्कड़ सा, साँवला, गबरू। उसके बायें हाथ में लम्बी सी बांसुरी है और उसी हाथ की कलाई में ताम्बे का कंगन झूल रहा है। रंगीन सा दिखने वाले जंगल में वो एक पेड़ के साथ सटा खड़ा है, उसके सर पे सावे रंग का साफ़ा बंधा है जिस से काले, घुंघराले बालों की दो लटें सांप सी बल खा रही हैं, कन्धों से लटका हल्दी से पीले रंग का अंगोछा उसके सामने झूल रहा है। डिबिया नुमा एक तावीज़ उसके गले में लटका है और दूसरा उसके दाहिने बाजू पे बंधा है। उसके माथे पे छोटा सा काला टीका है लगता है उसकी माँ ने सुबह ही उसकी नज़र उतारी होगी। उसका बदन नीला है और गज़ब नशीली आँखें हैं। आर्टिस्ट ने उस पेंटिंग का टाइटल “कृष्ण” दिया था। मैंने जब उसे पहली बार देखा था तो मुझे उसमे सिर्फ और सिर्फ राँझा दिखा था। वारिस शाह का राँझा, तख़्त हज़ारे का राँझा। पेंटिंग के उस नज़ारे को देख कुछ ऐसा महसूस हुआ था की वहीँ कहीं पेड़ों के झुरमट के परे चनाब दरया का किनारा होगा जिसके परे रांझे की हीर मिट्टी का घड़ा पकडे उसे मिलने का इंतज़ार कर रही होगी।
ख़रीदने के बाद मेरे लिए वो पेंटिंग रांझा हो गयी थी और मैं उसे देख वारिस शाह को याद करता, उस प्रेम कहानी को दोहरा भैरवी में हीर के कुछ टुकड़े गुनगुना लेता था। इस बात पर माँ और मैं कई बार बहस कर चुके हैं पर उन्हें उसमे अपना बांसुरी वाला कृष्ण-कन्हैया ही दिखता है चाहे उसके सर पे मोर पंख हो या न हो । शायद नींद में माँ अपने कृष्ण की बांसुरी भी सुन लेती हों तभी मंत्र मुग्ध हो सोती रहती हैं।
माँ के कृष्ण माखन चोर बाल गोपाल से ले कर वृन्दावन के कुंज विहारी और गोपियों के रास रचैया तक आ कर रुक जाते हैं। इसके बाद के कृष्ण से माँ का कोई वास्ता नहीं है। महाभारत के कृष्ण जो ‘यदा यदा ही धर्मस्या’ का उपदेश देते हैं वो माँ के लिए कभी नहीं थे, वो युद्ध, वो मार काट और कृष्ण का पक्षपात माँ के मिथक का हिस्सा नहीं हैं। माँ ने धर्म की बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, धर्म को उन्मादियों के हाथ जीतते और धर्म को इंसान के हाथ हारते हुए भी देखा है। धर्म के नाम पर दंगे, आगज़नी, हिंसा, मार-काट और बटवारें उनके बचपन से माँ के साथ रहे हैं। तक़सीम की उन यादों और भयावय तस्वीरों से निजात पा लेना उनके लिए नामुमकिन था। इसी कारण हँसते-खेलते, रास करते, बांसुरी बजाते कृष्ण ही उनके इष्ट रहे।
पहले माँ मुँह ढक के सोती थीं, रज़ाई या चादर पूरे चेहरे को अंदर समेटे, जाने सांस कैसे लेती थीं। पर अब, अब ऐसा नहीं करती सर्दी में भी रज़ाई ठुड्डी से नीचे ही रहती है। बाजु अंदर, होंठ हल्के से खुले, पीछे को खींचे सिमटे बाल, कंधे समतल और वो बिलकुल सीधी लेटती। मेरी तरह दायें, बाएं, या पेट के बल नहीं। रात भर हिलती भी नहीं हैं। हर रोज़ नहीं पर कभी कभी खर्राटे भी लेती हैं, ज़ोर से । उनके कमरे में लगा कैमरा बताता है की रात में एक दो बार उठती हैं और अपनी नन्हीं सी प्लास्टिक की बोतल से पानी पी कर फिर सो जाती हैं।
पहले उनकी नींद बहुत कच्ची थी ‘ज़रा से आहट’ वाली, चौकन्नी। मैंने कई बार सोचा ऐसे कैसे पूरी होती होगी इनकी नींद। सुबह भी छह बजे उठ खड़ी होती थीं, हाँ पिछले दस बारह सालों में दोपहर को झपकी ले लेती थीं, “खाना-खाने के बाद मुझे अक़्सर नींद आ जाती है”, ऐसा कह वो अपनी झेंप छुपा लेती हैं।
कच्ची रही हो या पक्की दिन की हो या रात की, माँ को नींद तो प्यारी थी, हमेशा। हमारी तरह वो देर रात तक जाग नहीं सकती थीं, ना अब ना पहले। हमारे बचपन में भी सोये बिना उनका गुज़र नहीं था। घर भर का सार काम, बच्चों की देख भाल और उनके लफड़े, बिरादरी और रिश्तेदारों से निपटना और तंगहाली में घर चलाने आदि से माँ थक तो जाती ही होंगी।और फिर वो ज़िन्दगी ही क्या कि इंसान चैन से सो भी ना सके। साइंसदाँ बताते हैं कि जब हम सो रहे होते हैं और गहरी नींद में होते हैं तब हॉर्मोन हमारे शरीर को दुरुस्त करते हैं और हमारे जिस्म में नई ऊर्जा भर देते हैं जिसके बाद उठने पर हमे ताज़गी और ख़ुशी महसूस होती है। दिमाग़ी कश-मक़श से परे नींद तनाव को सोख लेती है।
इस खोज का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि एक रात की नींद पूरी कर लेने पर इंसान सुबह खा पी कर फिर से सोने की तैयारी कर सकता है। “मैं सोती हूँ तो इसमें हर्ज़ा क्या है, हैं?” माँ पूछती है।
“तुम लोग परेशान क्यूँ होते हो?” कहते कहते फिर से वो निंदिया के उड़न खटोले में परवाज़ ले लेती है। मुझे कुंदन लाल सहगल की गाई लोरी याद आती है ‘सो जा राजकुमारी सो……जा’

12 दिसंबर 2024

Ma in her bed, in her room with attendant Rashmi
Ma, as the winter of 2024 approaches

डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना!

“Anoop is gone.”  टेबल के दूसरी तरफ से अपने लैपटॉप की स्क्रीन से उचक कर देखते हुआ रजनी ने मझे बताया। वो दुखी थी, मैं कुछ लिख रहा था। डायरी और पेन को एक तरफ सरका मैं अनूप नायर का चेहरा याद करने लगा। आठ रोज़ पहले ही हम उसे देखने उसके घर गए थे। कल सुबह उनकी पत्नी राजी का मैसेज आया था ‘अनूप ठीक नहीं लग रहे उन्होंने काली उलटी की है और उनकी सांस भी उखड रही है”। कल से आज तक अनूप ने अपनी ज़िन्दगी एक दिन और बढ़ा ली जो और कई  साल लम्बी होनी चाहिए थी। अनूप शायद 70-71 के रहे होंगे वो पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे थे। 

अनूप मेरे दोस्त नहीं थे। मैं उन्हें बस जानता भर था।  कुल दस बारह बार मिला था। हमारे बच्चे एक ही स्कूल में पढ़े थे। बच्चों ने स्कूल के करीब 10 साल इकट्ठे गुज़ारे जिस नाते बच्चों का काफी मिला जुलना था। स्कूल के बाद अगले 15 साल में उनकी दोस्ती में कई नए जुड़ाव आये – नाटक, संगीत, गाना, लिखना और अभिनय जिस से दोस्त और नज़दीक आ गए। रजनी और राजी की दोस्ती भी बच्चों पर नज़र रखने वाली माओं सी थी। अनूप और राजी एक दो बार हमारे घर भी आये थे। 

अनूप हसमुख थे। आम भाषा में कहा जाए तो अनूप आम आदमी थे, “हैप्पी गो लकी”। मेरे जैसे, हमारे जैसे, दुनिया के आम बाशिंदो जैसे जिनमे कोई लाग-लपेट नहीं होती। मैं जितना भी उन्हें जानता था मेरी समझ से वो अच्छे और सुलझे हुए इंसान थे। कोई नेता, अभिनेता, उद्योगपति, ज़मींदार या भाव खाने वाले रईस नहीं थे। प्यार से और धीमा बोलने वाले प्यारे से इंसान थे। कोई उन्हें मिल कर ये नहीं कह सकता था कि वो केरल से थे मुझे वो आधे पंजाबी लगते थे, उनकी बोली में मलयालम के सुर न थे। पेशे से वो टूर एंड ट्रेवल एजेंट थे। पर वो वैसे टिकट बनाने वाले ट्रेवल एजेंट नहीं थे। 

अनूप घुमक्कड़ किस्म के इंसान थे सो उन्होंने नए देश, पुरानी संस्कृतियां और नए नज़ारे देखने को ही अपना पेशा बना लिया। अनूप की कंपनी के साथ कई विदेशी विश्वविद्यालय जुड़े थे जहाँ के छात्र खास तौर पर शोध या रिसर्च करने वाले छात्र हिंदुस्तान को जानने और समझने के लिए आते थे। उन स्कॉलर्स या छात्रों के लिए ताजमहल और लालकिले से परे वाला हिंदुस्तान भी अहम था इसलिए अनूप उन्हें दूर दराज़ के गांव और छोटे शहरों में रहने वाला हिंदुस्तानी और उनका इतिहास समझने और दिखाने ले जाते थे। हिंदुस्तान आने वाले उन छात्रों को अनूप वहां की संस्कृति, तहज़ीब, पहनावा, खान-पान, सभ्यता, सक़ाफ़त और सच्ची विरासत नज़दीक से दिखाना चाहते थे। अनूप जब बात करते थे तो अपनी दुनिया में चले जाते थे – गुडगाँव, दिल्ली, बम्बई और कोच्ची से परे। उनकी दुनिया बर्फ से ढके सफ़ेद पहाड़ो और हिमालय की वादियों सी शांत और सुन्दर थी। उस दुनिया के पास कहीं अथाह समुन्दर की गहराइयाँ थी और कहीं रेगिस्तान के रेतीले टीलों से दिखने वाले सूरज की लालिमा। उन्हें जंगल भी पसंद थे और ऊँची इमारतों वाले शहर भी। ले दे के अनूप मस्त मौला इंसान थे।   

अनूप और राजी दो बार हमारे दफ्तर भी आये। उन्होंने अपनी एजेंसी का रंगीन कैटेलॉग बनाने का ज़िम्मा मुझ पर सौंपा था। बस उन्हीं दिनों में मैंने अनूप को नज़दीक से देखा और जाना। आखिरी बार 28 अक्टूबर को जब मैं उनसे उनके घर पर मिला तो बहुत ही धीमी आवाज़ में उन्होंने ने मुझ से पूछा “अभी भी पहाड़ पे जाते हो ?” इस सवाल पर हम दोनों की आँखें मिली और जवाब में मैंने हाँ कहते हुए उनका हाथ अपने हाथ से सहलाया । उनके हाथ में अब वो गर्म जोशी नहीं थी। उनका स्याह पड़ता चेहरा मुरझाया हुआ था। शरीर का वजन शायद आधा रह गया था, अपने-आप बिस्तर से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। दर्द उनके चेहरे पे लिखा था पर फिर भी अपनी भीनी-भीनी मुस्कान से वो मुझे बिस्तर पर पकड़ के बैठे थे। बड़ी व्यथा थी। मैं उनसे बात भी करना चाहता था पर ये नहीं चाहता था की ज़्यादा बोल कर वो थक जाएँ। डॉक्टर लोग हमे पहले ही बता चुके थे कि बात अब कुछ रोज़ की ही है। डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना ?

और फिर अनूप चल बसे। जी हाँ गुज़र गए।  इस ‘जाने” को कैसे कैसे शब्दों में कहा जाता है, लिखा जाता है, व्यक्त किया जाता हैं। जाना या गुज़रना दोनों शब्द यात्रा से भी जुड़े हैं – देशाटन से, सफ़र से, दौरे से, भ्रमण से, रास्तों से प्रकृति से, घुमकड़ी से, सैर-सपाटे से   – बाहरी और अंदरूनी ख़ोज से। ‘गुज़र गए’ से ऐसे लगता जैसे कोई अभी सामने वाले रास्ते से गुज़ारा है और घूम कर पीछे वाले रास्ते से आ जायेगा या ऐसे की वो अब नए घर को चला गया है या फिर यूँ कि वो आये थे अपना काम पूरा कर वो दूसरे काम को निकल गए, एक नई यात्रा को एक नए दौरे पर। 

अनूप यात्राओं के बिज़नेस से जुड़े थे। ता उम्र वो खुद भी घूमे और हज़ारो साथियों और यात्रियों को भी घुमाया, मेरा मानना है वो इस बार किसी लम्बी यात्रा में निकल गए हैं। फिर मिलेंगे दोस्त, किसी नए रास्ते पे नए मुकाम पे। तब तक के लिए प्यार भरा सलाम। 

5 November 2024

At the memorial for Anoop Nair On 8th November 2024, Zorba the Buddha, Delhi

Death and Design

How can ‘design’ help us think differently about death?

A series of interesting conversations among the international design community about “Death and design: the creative projects confronting society’s ultimate taboo.”

“The visual language of death has stagnated, and creatives have a vital role to play in how future generations face its complex subjects. Here, we chat to a design research practice dedicated to death, and delve into some of the topics covered at their recent conference, from symbols of death and branding the end of life, to ‘traumacore’.

Death: it’s a topic that often feels like no one really wants to talk about. Especially, that is, in the buttoned-up culture of avoiding difficult topics that the UK is so well known for. But whether we like it or not, death is something every single person will deal with in their lifetime, and one day encounter themselves.”

​Death and Design? While the world deliberates the essential nature and icons of death, I wonder if the Indian design community has ever given it a thought. 

*Strong content warning: this article explores many sensitive topics, including death.

Sitaram Yechury

Sitaram Yechury passed away this morning (12 September 2024) around 11.30 at AIIMS. He had been unwell with a lung infection for the past three weeks admitted in the hospital. Our last meeting was at Sahmat, probably on 18 August. All of us had lunch together and then he stepped out for a smoke with Sohail and NK Sharma. His right hand was not steady and it trembled as he took a drag on his stick. He coughed non-stop. Something in me said, he must stop smoking. We had a good time together on Seema’s birthday sometime in Jan this year, again at Sahmat. I have some pictures of them cutting cake and offering it to each other. I recall how unsure or hesitant he was to sign a copy of his book for me for which I had designed the cover. All he wrote was “Greetings”. It was a compilation of his speeches as a Rajya Sabha MP. On 14th Sept his body was brought on a carriage to AKG Bhavan, the Party office, for friends and Comrades to pay their last respects. Sitaram had donated his body to All India Institute of Medical Sciences for research. So Long Comrade. 

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that must be some else…

‘It couldn’t be him. It just can’t be. It must be someone else.’, was my first reaction when a common friend sent me a picture of his flower-decked bier lying outside his house in Jalandhar. I recalled Ashok Gupta reciting a Kafi of Baba Bulleh Shah at Zoji La pass where we saw a holy man being carried for burial.  

बुल्ले शाह असां मरणा नाहीं गौर पया कोई होर 

“It must be someone else, we ‘the immortals’ don’t die”, Ashok had said.

Years before he had said something similar when we had ‘together’ seen death at close quarters.

It was the month of June. Twenty-ninth read the date in the year 1985. By mid-night the temperature was 12 below zero. On the Tibetan plateau our altitude was 17,300+ feet. We were at the western edge of lake Manasarovar. We kiss-drank its partially frozen surface the next morning. Without gloves our hands were slowly turning blue. Strong easterly winds howled the earlier part of that night. I wonder how we survived that night amid nothingness. Yes, survived brutal cold, hunger, fatigue and the fear. The fear of having lost our way in the Himalayan desert. The fear that no one may come looking for us or consider us dead in that Himalayan moonscape. One more night out in the open would have meant certain death for the three of us. But, but Ashok had said “We can’t die here uninvited”. 

That night Ashok Gupta was wearing his trademark white kurta-pyjama, no thermals inside. The hood of his blue wind-cheater protecting his ears and head. Arun Singhal, our other friend was decently clad in a high neck sweater but not enough for that altitude or the open skies where a little more cold could have frozen us. Unless you are a Mongol nomad, a Tibetan herder or a Chinese military jawan you dont fools around Mt Kailash or Ghurla Mandhata ranges carelessly at night. We were not fooling around, we had lost our way. 

Five other members of our group were accompanied by a Tibetan yak herder who was transporting our camping equipment. That night we clung to each other in a tight embrace to conserve body-heat, arms locked we jogged in-sync, we created a tight triangle of bodies using our breath to warm our chests and ward off the cold with our back, we pissed on our feet when our toes were freezing. We cursed ourselves but never once thought that we would die that night. The thought of death came only next afternoon when despite all our efforts we were not able to find the trail that would lead us to our campsite. Our batchmates were supposed to leave for the next campsite by noon. None of us had any communication equipment or anyone to guide. 

The morning before was the most inviting one which lured us to make multiple mistakes. We decided to shed extra layers and trek leisurely around the undulating Barkha Plains. The day temperature tempted us to slow down our pace, rest more often, fish in streams, stop to photograph each Marmot peeping at us from its hole, admire and lure herd of Tibetan Wild Ass and the colony of white woolly hare. We were in the awe of the beauty, the sheer scale of the Himalayan plains where a hundred aeroplanes could land together. With no clouds and a bright sun that hurt during noon we enjoyed the stark contrast of the blue skies against white Himalayan peaks and stunning granite rocks. That morning, together, we had spotted a Brahminy Duck diving in Mansarovar for its catch. Ashok had said it was a good sign.

My brown corduroys, a wind breaker and a muffler around the neck worked well during the day but at night I was the worst clad. We hadn’t had a morsel since we left last camp and I was reminded of the Brahminy Duck all the time. How many fish it would have devoured that morning? We trudged up and down a dozen hills that evening before the Lords switched off the light in that stunningly beautiful playground for their ilk to sleep.

To reach our Himalayan Eden we traversed four major valley systems connecting India, Nepal, Tibet and China. We trekked over 129 km in 28 days, without a day’s break, crossing two high-altitude mountain passes one of which, Dolma La, was over 18,470 feet, braved treacherous crevices over unstable glaciers, were beaten down by winds and thunder, negotiated and forded near-freezing streams, glacial melts and rivers. We slipped around gorges; skidded off steep gradients; spent sleepless nights with minimal food; braved freezing winds, rain and snow but we survived. We survived our bursting lungs in rarified atmosphere, yes we survived this and dangers of many other climbs and high-altitude treks. Did we survive to die like this? 

Sorry, I can’t say my Alvida, not yet.
गौर पया कोई होर
Yes, that must be some else.