Sitting on the divider median (the central verge) of the very busy Baba Kharak Singh Marg intersection this woman, smoking a bidi and puffing out plumes of smoke is an epitome of bindaas carefree life. January 1st 2025. I take it as a sign that 2025 is going to be equally bindaas. (Connaught Circus, Delhi)
gam aur khushi mein farq na mehsoos ho jahan, mein dil ko us muqaam pe laata chala gaya har fiqr ko dhuen mein udaata chala gaya
Sitaram Yechury passed away this morning (12 September 2024) around 11.30 at AIIMS. He had been unwell with a lung infection for the past three weeks admitted in the hospital. Our last meeting was at Sahmat, probably on 18 August. All of us had lunch together and then he stepped out for a smoke with Sohail and NK Sharma. His right hand was not steady and it trembled as he took a drag on his stick. He coughed non-stop. Something in me said, he must stop smoking. We had a good time together on Seema’s birthday sometime in Jan this year, again at Sahmat. I have some pictures of them cutting cake and offering it to each other. I recall how unsure or hesitant he was to sign a copy of his book for me for which I had designed the cover. All he wrote was “Greetings”. It was a compilation of his speeches as a Rajya Sabha MP. On 14th Sept his body was brought on a carriage to AKG Bhavan, the Party office, for friends and Comrades to pay their last respects. Sitaram had donated his body to All India Institute of Medical Sciences for research. So Long Comrade.
शरत चंद्र चटोपाध्याय के लिखे बांग्ला उपन्यास “देबदास” (1917) में पारो के क़िरदार का असली नाम पार्वती है। ये वो पार्वती है जिसका प्यार परवान न चढ़ सका, उन चंद लम्हों के लिए भी नही जब देवदास उसके घर के बाहर आख़िरी साँसे गिन रहा था। प्रेम और विरह के दर्द की अद्भुत कहानी तीन किरदारों की है – देवदास, उसके बचपन की दोस्त पारो यानि पार्वती और पेशे से तवायफ चंद्रमुखी की। देवदास के अज़ीम किरदार और इस कहानी पर तीन बार हिंदी फिल्म चुकी हैं। हालांकि पार्वती या पारो और चंद्रमुखी के क़िरदार भी कुछ कम नहीं हैं फिर भी फ़िल्म बनाने वालों ने हर बार पुरुष प्रधान फिल्म ही बनाई। इसके बावज़ूद फिल्म देख कर जब आप थिएटर से बाहर आतें हैं तो चंद्रमुखी या पारो के बारे में ही बात करते हैं, देवदास हर पल अपने को मौत की तरफ़ धकेलता है और मर चुका होता है । “कौन कम्बख़्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है , मैं तो पीता हूँ के बस साँस ले सकूँ “। फिल्म पहली बार 1936 में कुंदन लाल सहगल के साथ, दूसरी बार 1955 में दिलीप कुमार वाली और 2002 में शाह रुख़ ख़ान के साथ बनी । उपन्यास को आये 107 साल और आख़िरी देवदास फिल्म को आये 22 साल हो चुके हैं फिर भी कुछ ऐसा है इस कहानी में कि हम इसे भूलना नहीं चाहते। इश्क़ की टीस और इस बुझते अलाव में चिंगारियों को ज़िंदा रखना चाहते हैं। तीनों फिल्मों के मुख्य पुरुष अभिनेता या फ़नकार ट्रेजेडी किंग माने जाते हैं फिर भी पार्वती या पारो की ट्रेजेडी फिल्म की ट्रेजेडी है।
आपका दिल किस पारो पे लुटा था ?
एक पारो और है। इस पारो की ट्रेजेडी भी शरत चंद्र की पारो से कम नही। अदब या साहित्य की दूसरी पारो। नमिता गोखले के अंग्रेज़ी नॉवेल ‘पारो’ वाली पारो। नमिता जी ने अपनी पारो के क़िरदार को पार्वती की लाग लपेट से दूर रखा। ये पारो 80 के दशक की दिल्ली से है, शरत चंद्र के भद्र लोक से दूर। इस पारो को अवतरित हुए भी 40 बरस हो चुके हैं। पहली बार ये क़िताब 1984 में छपी थी और तब से लगातार बिक रही है । इस पारो को मैं कल दोबारा मिला।
21वीं सदी के माहौल में पारो ने एक और उत्तेजक अंगड़ाई ले कर ढ़ीली चड्डी वाले दिल्ली के मर्दों की फिर से आज़माइश करने की ठानी है। कहीं रूमानी, कहीं आशिक़ाना और कहीं कामुकता के हर परदे को उठाती पारो ऊपरी सतह पर तैरती समाज की हर असलियत और कमज़ोरी को बीच बीच में सामने लाती है। हर औरत के अंदर एक पारो छुपी है, ज़रूरी नहीं के उसके सपने लालसा और वासना से भरे होते हैं पर वो भी अमीरों और पहुंचे हुए तबके की दुनिया को देखना चाहती है, छूना चाहती है उसका ज़ायका लेना चाहती है। वो जानना चाहती है कि देखते ही देखते दूसरी औरत कैसे मध्यम वर्ग से उच्च वर्ग में अपनी पहचान बना लेती है और ये समाज कितनी आसानी से सब देख कर भी अनदेखा कर देता है, मक्खी निगल लेता है। पारो की कहानी प्रिया बताती है, दिल्ली और बम्बई समाज की जिसमे कोई देवदास नहीं होते हुए भी प्रेम दुखद ट्रेजेडी ही रहता है।
‘पारो’ के नए संस्करण और किताब के 40 साल के सफ़र पर नमिता गोखले जी से अम्ब्रीश सात्विक की रोचक बातचीत कल शाम (24 अगस्त) दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में हुई, जिस से लेख़क और क़िताब के बारे में कुछ नई बातों का पता चला। इसी साल, 2024 में, पेंगुइन ने इसे अपनी क्लासिक श्रंखला में छाप कर “पारो” को गौरव ग्रन्थ या आला दर्जे का क़रार दिया है। यक़ीनन पारो एक क्लासिक है। आप ज़रूर पढ़ें।
सोचिये, 17वीं सदी के मुग़ल बादशाह शाहजहां और महारानी मुमताज महल की बड़ी बेटी, होने वाले मुगल सम्राट औरंगज़ेब की बड़ी बहन, छोटे भाई दारा शिकोह की प्यारी जहाँआरा बेगम अगर उन दिनों खो गई होतीं तो क्या क्या होता। मेरा मानना है कि अव्वल तो ये हो नहीं सकता या सोचा भी नहीं जा सकता पर अगर होता तो तारीख़ में हमे एक और बड़ी जंग या धर पकड़ के बारे में पढ़ने को मिलता। ( जहाँआरा बेगम 23 मार्च 1614 अजमेर – 16 सितंबर 1681 दिल्ली)
मान लीजिये किसी दुश्मन ने चाल चल भी ली होती कि उन्हें अगुवा कर लिया जाये तो ये दिल्ली या आगरा के लाल किले के अंदर से तो मुमक़िन नहीं था, न ही बाज़ार चांदनी चौक से तो फिर शहज़ादी जहाँआरा को कहाँ से उठाया जा सकता था। वैसे जहाँआरा को अच्छी घुड़सवारी आती थी, वो बन्दूक चलने और निशाना साधने में भी माहिर थीं, तीरंदाज़ी और तलवार चलना तो हर मुग़ल शहज़ादे और शहज़ादी को बचपन में ही सीखा दिया जाता था। इतने सब हुनर होने के बाद जहाँआरा को अगवा करना कोई मज़ाक नहीं था।
जहाँआरा की तीन बहने भी थीं। पुरहुनर बानो उनसे बड़ी थीं, रोशन आरा उनसे छोटी और गौहर आरा सबसे छोटी । गौहर आरा महारानी मुमताज महल की चौदहवीं और आखिरी संतान थीं। उनको जन्म देते हुए उनकी माँ मुमताज महल की मौत हो गई। गौहरा आरा बच गईं और 75 साल की लम्बी उम्र तक ज़िंदा रहीं। बीच वाली बहन जहाँआरा से छोटी रोशन आरा नटखट और शैतान थीं। ये वही है रोशन आरा जिन्होंने उत्तरी दिल्ली में बहुत बड़ा बाग़ बनवया। जिसके नाम पर वो बाग़ आज भी क़ायम है, रोशन आरा बाग़। इस बाग़ से थोड़ी दूर दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास एक और बसा-रसा इलाका है मलका गंज, उसे भी रोशन आरा ने ही बसाया। इस इलाके का असली नाम मल्लिका गंज था, यानि मल्लिका रोशन आरा द्वारा बसाया हुआ इलाका जहाँ उनके हाथी, घोड़े, सिपाह-सालार उनके ज़ाती काम करने वाले लोग रहते थे।
सम्राट शाहजहां के सिपाहियों और जासूसों की मानी जाये तो जहाँआरा को दिल्ली में जमुना पार अपने भाई दारा शिकोह के खेमे से यक़ीनन उठाया जा सकता था जहाँ हिफाज़त का इतना बंदोबस्त नहीं था। पर अब 500 साल बाद ये सब अटकलें बेमानी हैं। इस ज़माने में जब रोज़ अकेले दिल्ली से ही 100 से ज़्यादा बच्चे और बड़े या तो अगुवा कर लिए जाते हैं या पुलिस रपट के मुताबिक़ खो जाते हैं तो कुछ भी हो सकता है। आजकल खो जाने वाले इन बच्चों, नौजवानों और बुज़र्गों को कहाँ खोजा जाये , कैसे ढूँढा जाये ये एक बहुत बड़ा सवाल है। इनमे से कुछ तो ख़ुद घर छोड़ के चले जाते हैं कुछ हादसे वग़ैरह में मारे जाते हैं और कुछ चोर डकैतों के गिरोहों द्वारा अग़वा कर लिए जाते हैं। इन खो जाने वाले में लड़कियों की ख़ासी बड़ी तादाद होती है। इन बेचारी लड़कियों को जाने क्या क्या सहना पड़ता होगा किन किन मुश्किलों से गुजरना पडत होगा। ज़्यादातर लड़कियां जिस्म बेचने और बाज़ारू काम के लिए अगवा कर के दुसरे शहरों और कई बार तो दुसरे मुल्कों में भी बेच दी जाती हैं। हमारी सरकारों को इस तरफ़ ख़ास ध्यान देना चाहिए।
ख़ैर, यहाँ ज़िक्र किसी और जहाँआरा का हो रहा है, आज की जहाँआरा का।
जहाँआरा खो गई है, ग़ुम हो गई है। जी हाँ जहाँआरा। क्या मालूम उसे कोई अगवा कर के ले गया है या बेचारी किसी हादसे का शिकार हो गई हो या फिर वो किसी वजह से तंग आकर घर से भाग गई है। अखबार में इश्तिहार आया है। उसकी फ़ोटो भी छप्पी है, बेचारी मासूम बच्ची सी दिखती है।
जहाँआरा वल्द ज़हाँगीर। जी हाँ 21वीं सदी के ज़हाँगीर की प्यारी बेटी है। कितने दुखी होंगे जहाँआरा के अब्बा और अम्मी। सोचिये तो। (वैसे ज़हाँगीर, शहज़ादी जहाँआरा के दादा थे – ये वाली जहाँआरा शाहजहाँ और मुमताज महल की बेटी नहीं है।)
जहाँआरा वल्द ज़हाँगीर दिल्ली के जहांगीर पुरी इलाके में रहती थी। उम्र 15 साल, रंग साफ़, गोरेपन की तरफ, गोल चेहरा, गठा जिस्म, सुन्दर सी दो चोटियां बनी हैं, पीला कुरता, काला पजामा और हवाई चपल पहने अपने घर के पास से 5 जुलाई से लापता है। पुलिस ने पूरी तहक़ीक़ात करने के बाद इश्तिहार दिया है। पर सोचिये अब अगर पुलिस को ही नहीं मिल रही तो जनता को कैसे मिलेगी ?
फिर भी आपस सब कोशिश तो कीजिये। तस्वीर को ध्यान से देख लजिए , शायद कहीं दिख जाये तो इतिल्ला कीजियेगा।
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Above: My inspiration: the original ‘Search for the Missing’ notice published in the Delhi edition of Indian Express.
Lifting myself from under the sheets; or pulling out of a Jaipuri, a duvet, a razai, or a clutch of soft-warm arms is a curse for the first 120 seconds of the day. I only want to be interacting with that something special which had enveloped me for the night. For the next ten minutes I don’t want to be seen by anyone nor do I want to see anyone while I offer thanks and prayers to Ra-Horakhty, the combo of Egyptian gods of light and heat.
A glass of water later and a walk out to the terrace having said my greetings to the seven horses that pull the royal chariot of Surya, the only thing I want to smell and see is a cup of hot coffee.
Minutes later, I am still blurred and spaced out – the hair as if an eleven thousand volt current cut through my body from north to south – the eyes still puffed up; the cheeks still red in part and off-colour in other areas slowly sucking the colours back from last night’s half a bottle of rum. The next thing I want to see in my hands is the book that was delicately placed on the headboard last night.
The feet, by then, have found the rhythm, the eyes can now focus, the saliva lined with poison now craves for another cuppa. Sensations having returned to all faculties in turn tingle the ear which feels an instrument, a pencil, entangled in the hair scratching the neck. A scab hurts. Ghosts of undecipherable notes swim in the crinkled scraps that I fish from under the sheets. Riding the morning breeze, lyrics of romantic score float in — tootle-too of a flute reminds me of ‘Noisy Poems‘ by James Reeves.
The notebook comes alive. Looking at the yellow dahlia blooming in the pot I remind myself, ‘there is a lot to live for and celebrate’. I don’t pluck the pretty flower, instead I offer the pot and say, ‘So what if Valentine’s Day is gone – the spring is here, send me a kiss’.
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